रणजीतों के शौर्य को नमन के लिए तैयार है मेनार ,मनाएंगे मुलगों पर ऐतिहासिक जीत का जशन

मेनार। जमरा बीज 3 मार्च की रात मेनार में रणबकें  ढोल की धाप पर तलवारे खनकेंगी। तोप-बंदूके आग उगलेगी ओर आतिशबाजी नजारे होगे। यह सब होगाा मुगलों पर फतह पाने वाले रणजीतों को याद में कस्बावासी जोश से लबरेज इस आयोजन की तैयारी के अंतिम चरण मे है। बुजुगौं का कहना है की यह परम्परा चार सदी से भी ज्यादा पुरानी है। मुख्य ओंकारेश्वर चौराहे पर सतरंगी रोशनी से नहाएगा ,जंहा दिनभर रणबांकुरा ढोल बजेगा। दोपहर एक बजे ऐतिहासिंक लाल जाजम चबूतरे पर बिछेगी ओर मेनारिया समाज के 52 गांवों के पंच मोबबिर पांरपरिक सफेद-कपडो कसुमल पाग पहनकर जुटेंगे। अमल-कसूंवा की रस्म अदायगी के बाद देर शाम मुख्य चौराहे से पांच मशाले रवाना होगी। इसी बीच रात पौनें दस बजे तक स्थानों  पर अलग-अलग मोहल्ले के लोग इक्कठा होगें। मशालें  लिए ये सभी पांचों रास्तो  से बंदूके-दागते हुए औकारेश्वर चौराहे की ओर बढेंगे। पांचों दल चबूतरे  से दूर आतिशबाजी के साथ तोप से गोले भी दागेंगे।


देश-दुनिया से होगी घर वापसी:- मेनार में  जमरा बीज महोत्सव का उत्साह दीपावली से भी ज्यादा होता है। यही कारण है कि देश-दुनिया  में  रोजगार-कारोबार करने वाले मेनार के मूल निवासी भले दिवाली पर न आऐ जमरा बीज पर जरुर लौटते है। इस गांव के लोग लंदन,दूबई,अमेरिका,हांगकांग,ओमान,अफ्रिका,बेज्जियम सहित कई देशो  में बसेे इसके अलावा मेवाड़-मालवा ओर अन्य राज्यों से भी रोजगार से जुड़े है।


यह है जमरी गैर,जिससे है जोश ओर रोमांचः- गैर राजस्थान का पांरम्परिक लोकनृत्य है जिसके नर्तक हाथ में  खाड़ा छड़ी लिए घेरे में नाचते है। यहां पुरुष तलवारो  के साथ गैर रमते है। तलवारो को  उंचा उठाकर ललकारने ओर टकराने की आवाज से एकबारकी रणक्षैत्र जैसा आभास करवाती है। नर्तकों को का  जोश देखने वालों को भी रोमाचित कर देता है। यह कारण है कि इसे जबरी गैर कहा गया है।


हर समाज की होती है भागीदारी:- इस महोत्सव में सभी जाति-समाजों की भागीदारी होती है। इनमें गुलाल आंगीकार करवाने सहित मंशाले थामने औकारेश्वर चबूतरे की लिपाई-पुताई मशालों के लिए तेल देने, सूरक्षा व्यवस्था  के दलों के कूच का संकेत भी शामिल है।

संवाददाता – जयदीप चौबीसा