भक्ति के लिए मंत्रों की नहीं मन की जरूरत- साध्वी हंसादेवी सरस्वती

मेवाड़ किरण @ नीमच -

मां का ह्रदय भक्ति का स्वरूप है। भक्ति के लिए मंत्रों की नहीं मन की आवष्यकता होती है। सबरी को मात्र राम से प्रेम के कारण भगवान के दर्षन प्राप्त हुए। भगवान कृश्ण-राधा नवधा भक्ति की व्याख्या समझाते हुए कहा कि संतों के संग कथा सुनना व आत्म निवेदन जैसी भक्तियों का अनुसरण करने से भव सागर पार किया जा सकता है। यह बात सुश्री साध्वी हंसादेवी सरस्वती ने कही वे श्रीपंचमुखी बालाजी मंदिर कानाखेड़ा के स्थापना दिवस पर श्रीमद् भागवत कथा महोत्सव एवं अखण्ड रामायण पाठ ग्राम कानाखेड़ा में चर्तुथ दिवस षनिवार को श्रद्धालु भक्तों द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान गंगा में बोल रही थी उन्होंने कहां कि माता पिता की सेवा से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं। संसार में मोह होता है यही दुख का कारण है केवल मानव जीवन से ही मोक्ष सम्भव है जड़ भरत मुर्ख बनकर रहे। हिरणाकष्यप ने भक्त प्रहलाद को खूब प्रताड़ित किया लेकिन उसने प्रभु का स्मरण करना नहीं छोड़ा। राजा भरत मरते समय मोह हिरण के बच्चे में रहा तो अगला जन्म उनका हिरण के यहॉं ही हो गया था इसलिए मरते समय मोह प्रभु भक्ति में ही रहे। नारायण की सेवा करेंगे तो लक्ष्मी स्वयं ही चली आएगी सच्ची नारी वही है जिसके मन में पति का पहले सम्मान हो। हाथी मगरमच्छ की लड़ाई में हाथी का अंहकार टूट गया। हाथी की मृत्यु नजर आती है तब उसे भगवान याद आते है अंहकार से जब पतन होता है तब कोई साथ नहीं आता है। भगवान ने हाथी का कल्याण किया था कथा अमृत के ज्ञान से जीवन में पाप मिटते है अमृतधारा आती है। जीवन में कश्ट हो तो गुरू कोयाद करना चाहिए गुरू बिना ज्ञान नहीं मिलता है यदि हम किसी का धन उधार लेगें तो वह वापस अगले जन्म में भी चुकाना पड़ता है।

Source : Apna Neemuch