पाषाण कालीन औजार निर्माण तकनीक कार्यशाला : प्रतिभागियों ने बनाए पाषाण कालीन औजार

उदयपुर . साहित्य संस्थान जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी), सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय और उद्गम ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'पाषाण कालीन औजार निर्माण तकनीक' राष्ट्रीय कार्यशाला का मंगलवार को समापन हो गया। साहित्य संस्थान सभागार में आयोजित समारोह में प्रतिभागियों की ओर से बनाए गए औजारों की प्रदर्शनी लगाई गई।
समापन समरोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि प्रागैतिहासिक काल से पूर्व मानव पाषाण के औजार का प्रयोग करता था। इसी लिए इसे पाषाण पाषाण काल कहा जाता है। साहित्य संस्थान ने अपने प्रारम्भिक काल से ही पुरातत्व के क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ कर दिया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. शान्ति पप्पू ने कहा कि ये पाषाण कालीन औजार काटने, छीलने सहीत सभी प्रकार के प्रयोग में लिए जाते थे। उन्होंने कहा कि साहित्य संस्थान, सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय और उद्गम ट्रस्ट ने यह बहुत बड़ा आयोजन किया है। इससे विद्यार्थियों में पुरातत्व विषय के प्रति रुचि जागृत होगी। साथ ही उन्होंने सभी प्रतिभागियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि सभी प्रतिभागियों ने बड़े ही उत्साह से कार्यशाला में भाग लिया और पाषाण काल के बारे में जानकारी प्राप्त की। विशिष्ट अतिथि डॉ. कुमार अखिलेश ने कहा कि प्रारम्भिक मानव ने पाषाण से फलक निकालकर उसका उपयोग शुरू किया। उसके बाद 1.7 मिलियन वर्ष के बाद मानव विकसित होता गया और पाषाण के औजार का निर्माण करता गया।

 

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सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. प्रतिभा ने कार्यशाला की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की और कहा कि साहित्य संस्थान द्वारा ये जो शुरुआत की गई है इसे निरन्तर करने का प्रयास किया जाएगा। प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र दिए गए तथा प्रतिभागियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए, जिसमें अजय मोची, कंचन लवानिया, कोयल राय, आस्था शर्मा, रविन्द्र, जाकिर खान ने विचार रखे।
निदेशक प्रो. जीवनसिंह खरकवाल ने स्वागत उद्बोधन देते हुए यह कहा कि संस्थान द्वारा जो यह प्रयास किया गया है। इसमें सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय की प्रो. प्रतिभा और उद्गम के डॉ. राजेष मीणा का महत्वपूर्ण सहयोग रहा है।
संचालन संयोजक डॉ. कुलशेखर व्यास ने किया। उन्होंने कहा कि कार्यषाला से विद्यार्थी किसी नतीजे पर पहुॅंचता है और वह स्वयं यह तय कर सकता कि वह कहां खड़ा है। कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए उद्गम ट्रस्ट के डॉ. राजेश मीणा ने सभी का आभार व्यक्त किया और कहा कि यदि धरोहर से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का आयोजन किया जाता है तो उद्गम हमेशा तैयार रहेगा।