पहले घट्टियों ने दिलाई प्रसिद्धि, अब मार्बल में आगरिया का विदेशों तक नाम

प्रमोद भटनागर

आईडाणा. क्षेत्र का आगरिया कस्बा मार्बल खदान से पूर्व अनाज पीसने की घट्टियों के नाम से प्रसिद्ध था। समय के साथ हाथ से चलाई जाने वाली घïिट्टयों का प्रचलन काफी सीमित हो गया। ऐसे में आगरिया ने अब मार्बल के रूप में काफी ख्याती प्राप्त की। आज आगरिया के नाम से मार्बल देश सहित विदेशों तक बिक रहा है।
महिलाओं का जिस प्रकार रसोई से संबंध है, उसी प्रकार का संबंध गेहूं पीसने की घट्टियों से था। मेवाड़ में ये घट्टियां आमेट तहसील के आगरिया कस्बे की खदानों से निकलती थी। घर-घर में घट्टियां होती थी। ऐसे में अगर कोई युवती आगरिया से अन्य गांव में ब्याही जाती और उस गांव में आगरिया की घट्टियां उपयोग करने वाली महिलाएं उसे ***** बना लेती थी। यही कारण था कि उस समय से लेकर अब तक मेवाड़ के गांवों में 'थारे आगरिया की घट्टी, मुं आगरिया की आपा दोई बैना' कहावत प्रचलित है। हालांकि, वर्तमान में आटा पीसने में इलेक्ट्रोनिक चक्कियों का उपयोग होने से घरों से घट्टियां तो लुप्त हो गई, लेकिन बुजुर्ग महिलाओं के मुंह से आज भी यह कहावत सुनाई दे जाती है। वहीं, आज के समय में जब घटिï्टयों का उपयोग बंद हो गया है तो घट्टियां बनाने के काम में लाया जाने वाला वही मार्बल का पत्थर अब घर-प्रतिष्ठान के आंगन में लगाया जाने लगा, जिससे अब यहां का मार्बल अब देश ही नहीं विदेशों तक विख्यात है। ऐसे में क्षेत्र के लोगों को रोजगार मिल रहा है तो बाहरी लोग भी यहां आकर रोजगार कमा रहे हैं।
पर्यावरण चिंता का विषय
क्षेत्र में मार्बल की प्रचुरता से भले ही रोजगार की दृष्टि से यह क्षेत्र मजबूत है, लेकिन दूसरी और यही उपलब्धि यहां के पर्यावरण को भी बिगाड़ रही है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ कटने से पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन इसको लेकर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से आने वाले समय में यहां के लोगों के लिए यह नुकसानदायक हो सकता है।