तप से ही मनुश्य का जीवन संवरता है- पं. दशरथ शर्मा

मेवाड़ किरण @ नीमच -

जीवन में तप जरूरी है तप से ही मनुश्य का जीवन संवरता है। भले ही वह किसी भी रूप में हो। किसान द्वारा कृशि करना, माता-पिता की सेवा दीन दुखियो की सेवा करना सब तक के ही रूप है आज मनुश्य भंवरे की तरह हो गया है जो पांच इन्द्रियों के वष में होकर सत्कर्म के मार्ग से भटक जाता है और वह ईष्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। परमात्मा तो कण-कण में विद्यमान है, लेकिन उस ईष्वर को प्राप्त करने के लिए मनुश्य को इन्द्रियों पर नियंत्रण करना जरूरी है। यह बात पं. दषरथ षर्मा ने कही वे विवेकानंद नगर चम्बल कालोनी, इन्दिरा नगर, त्रिवेणी नगर, श्रीनाथ नगर भगवानपुरा, नीमचसिटी आदि क्षेत्र के भक्तों द्वारा एवं श्रीमद् भागवत भक्त मण्डल के तत्वाधान में सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के चर्तुथ दिवस षनिवार नीमच सिटी, मनासा रोड़, फिल्टर को फैक्टी के पिछे श्रीनाथ नगर स्थित षिव मंदिर प्रांगण में बोल रहे थे उन्होने कहां कि संसार में मनुश्य पाप नहीं करे और पुण्य कर जीवन का कल्याण करें। स्नान से षरीर, भागवत से आत्मा और मन पवित्र होता है यदि हम सुख में भगवान को याद करें तो दुख नहीं आते है। महाराज श्री ने कहा कि संतान जब रोती है तो मां की ममता प्रकट हो जाती है आत्मा ने मां को सहारा दिया तो अमर हो गई। परमात्मा में मां लगा तो परमात्मा बना। कथा वह जो जीवन में सघर्श के साथ जीवन जीना सिखा दे। अभाव को आदत बना ले तो जीवन में सुख ही सुख मिल जायेगा ज्ञान भक्ति वैराग्य को छोड़कर संसार सुख चाहता है जो संभव नहीं है कथा में उपस्थित श्रद्धालु स्वर्ग के बिन्दु से कम नहीं है कथा श्रावक केवल सुने ही नहीं उस पर आत्मचिंतन करें। मानव से झुठ, धोखा, अवगुण हो जाए कथा इसके विरोध में रहती है घबराएं नहीं लेकिन यह आदत नहीं बन जाए, अवगुण को षीघ्र भुला दें त्याग दें।

Source : Apna Neemuch