जीव दया बिना आत्मा का कल्याण नहीं होता है – कमलमुनि कमलेश

मेवाड़ किरण @ नीमच -

जीव दया बिना आत्मा का कल्याण नहीं होता है। रोगी की जान बचाने के लिए दंवाईया देना, भुखे को भोजन कराना, प्यासे को पानी पिलाना, अन्धे को सड़क पार कराना जैसे जीव दया के छोटे-छोटे पुण्य कर्म ही आदमी का चरित्र उज्जवल बनाते है महावीर स्वामी के अनुसार हर जीव में एक ही आत्मा विद्यमान होती है। क्योंकि आत्मा में ही परमात्मा होते है। परिवार की सेवा के बाद ही धर्म, कर्म का पुरूषार्थ सार्थक सिद्ध होगा। यह उद्गार राष्ट्र संत कमलमुनि ने व्यक्त किए। वे जैन कालोनी स्थित वर्धमान जैन स्थानकवासी श्रावक संघ द्वारा जैन स्थानक भवन में आज सुबह 9 बजे आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भाग्य कर्म से परिवर्तित होता है। अमेरिका का राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दलदल से सुअर की जान बचाई थी जो आज भी प्रांसगिक है। यदि मनुष्य के मन में जीव दया के भाव नहीं आते है तो वह व्यक्ति मिथ्या है। झुठे बर्तन घर के अंदर रात में नहीं रखना चाहिए। मानव खुद की सेवा नहीं कर पाता है चिंतन का विषय है। जहॉं सेवा नहीं वहा आत्मा का दिखावा है। कृष्णा ने कुबडृ को देखा ना जाने किस वेश में भगवान मिल जाय। माता-पिता की निस्वार्थ सेवा का फल तीर्थ दर्शन जैसा होता है जीव दया बिना आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता है। आज धर्म चार दिवारी तक सीमित है। सभी आत्मा एक होती है पंजाब क्षेत्र के प्रख्यात संत डॉ राममुनि निर्भय ने कहा कि कर्म संस्प को बढ़ाता है धर्म संसार को घटाता है मानव 23 घंटे कर्म कर सिर्फ एक घंटे धर्म करे तो भी उसका कल्याण हो सकता है एक घंटे में रोगी, भुखे, प्यासे की सेवा में लगा दे। एक सामायिक प्रार्थना आत्मा से शुद्ध हो जाए हमें आत्मा से जोड लें। 48 मिनिट की सामायिक हमारे संसार को समात्व कर देती है 48 मिनिट की धर्म आराधना 84 के चक्कर को समात्व कर सकती है सद् चरित्र, आचरण ही धर्म है। मंदिर धर्म स्थान है धर्म नहीं है आग्रम ग्रन्थों में धर्म नहीं है। आगम ग्रन्थों में सिद्धान्त है। आगमों में लिखा है अहिंसा परमोधर्म लिखा है वह सिद्धांत है वह सिद्धांत आचरण में आयेगा तो वह धर्म बन जायेगा। दया धर्म का मूल है। संत की ओर दृष्टि हो तो वह सत्य ग्रहण करेगी। दो घडी समभाव की
साधना करे तभी आत्मा का कल्याण होता है। जो आत्मा से जुड़ता है वह परमात्मा से जुड़ जाता है। आत्मा समभाव में रहे तो कर्मो की निर्झरा हो जाती है।

Source : Apna Neemuch