जीवन में संयम बिना मुक्ति नहीं हो सकती है – साध्वी गुणरंजना

मेवाड़ किरण @ नीमच -

मानव जीवन में हमारी श्रद्धा धन कमाने और अच्छा खाने में है जीवन में आत्म कल्याणक लिए श्रद्धा बिना धर्म बड़ा नहीं होता है मानव जीवन में जवानी को व्यर्थ नहीं करे इसमें भी धर्म कर्म का पुण्य करते रहना चाहिए क्योंकि बुढ़ापे में शरीर जीर्ण र्शीण हो जाता है तप, जप नहीं हो पाता है। इसलिए मानव संसारी जीवन में रहते हुवे भी संयम धर्म का पालन करे तो मुक्ति मार्ग मिल सकता है। यह बात साध्वी गुणरंजना श्रीजी मसा. ने कही वे बघाना शक्तिनगर स्थित श्री शंखेश्वर पार्श्व पदमावती धाम सभा भवन में आयोजित धर्मसभा में बोल रही थी उन्होने कहां कि प्रभु अच्छे और सच्चे है प्रमाद गलत है दुर्गति का कारण है पाप का पश्चाताप रोते-रोते करना चाहिए। पापवृति का त्याग करना चाहिए। किसी का दिल दुखाया तो धर्म सहज और सरल बन जायेगा। पाप त्याग की प्रतिज्ञा पश्चाताप हंसते-हंसते करेंगे आचार्य के दर्शन से जीवन में प्रसन्नता छा जाती हे। जीवन में बिगड़ता हुआ बन जाता है बना हुआ संवर जाता है त्याग बिना भाव शुद्धि नहीं होता है। जीवन में अधिक रूचि उत्पन्न होना चाहिए। दिपावली पर्व में भी भावों में मलिनता दूर होती है जीवन में श्रद्धा बिना धर्म बड़ा नहीं होता है। हमारी श्रद्धा धन कमाने और अच्छा खाने में है अध्यात्म क्षेत्र अवस्था नहीं व्यवस्था नहीं है ये जवानी बिखर जायेगी किसी काम की नहीं है। हमें चिंतन, मनन करना चाहिए हमें जवानी में भी धर्म कर्म करना चाहिए। महावीर स्वामी अतिम देशना प्रथम देशना में अनवरत देते है गौतम निरन्तर अनवरत सुनते रहते थे गौतम गुलाब जैसे है। परमात्मा का जन्म क्षेत्रीय कुण्ड में हुआ था। जीनवाणी जीवन के राग, द्वेष के जहर को समाप्त करती है। धर्म की पहली शर्त सहज सरल बनना है। तप, जप नियम धर्म की दूसरी शर्त है। राम, कृष्ण, महावीर चाहे किसे भी सुने लेकिन प्रेम से एकाग्रपूर्वक सुने। उत्तराध्यन सूत्र हमारे भीतर की अंतर वेदना को समाप्त कर अर्न्तर की चेतना को जगाता है अर्न्तर चेतना की जागृति बिना परमात्मा की परमात्मा की शरण नहीं मिलती है। रावण को अमृत नष्ट होने के बाद समझ आया था कि राम इंसान नहीं नारायण है। परमात्मा की वाणी हमें सत्यम शिवम् सुन्दरम से जागृत करती है परमात्मा की देशना हम श्रवण कर रहे है हमारा अहो भाग्य है सारे बिगड़े काम जिनवाणी से सुधार देती है। आचार्य सुना रहे थे गौतम ने सुनी थी। जीवन में संयम बिना मुक्ति नहीं हो सकती है हम राम, कृष्ण, महावीर जैसी संतान के लिए हम उसी तरह का आचरण करे। हमारा मन बैचेन है। गौतम की कली-कली खिल रही थी। हमारे भीतर संयम रूपी श्रद्धा के फुल नहीं खिलेंगे हमे आत्मा में प्रवेश करना होगा वेदना से संवेदना में प्रवेश कर हमारी आत्मा जीवन का कल्याण करना होगा। जीवन में सब कुछ भोग, ऐश, खाना पीना मिलेगा। सम्यक श्रद्धा विकसित कर आचरण विकसित करना मुश्किल है। साध्वी श्रीजी ने राजा सम्रपति, महावीर द्वारा उत्तराधन, अंतिम देशना, द्वितीय देशना आदि प्रसंगों पर भी वर्तमान परिपेक्ष्य में महत्व प्रतिपादित किया।

Source : Apna Neemuch