खाली रह गए उम्मीदों के हाथ, सरस्वती छोड़ चली गई साथ



चित्तौडग़ढ़. कन्नौज गांव के बाशिन्दो के लीवर की बीमारी से जूझ रही बेटी सरस्वती (स्वाति) गौस्वामी केे फिर से खिलखिलाते हुए देखने के सपने अधूरे ही रह गए। उसे फिर से स्वस्थ करने के लिए हर कोई भामाशाह बनकर आगे आ रहा था लोग उसके स्वस्थ होने की उम्मीद लगाए हुए थे। लोगों की उम्मीदे खाली हाथ ही रह गई और गांव की बेटी बन गई सरस्वती सबको गमगीन करते हुए मंगलवार शाम दुनिया से अलविदा हो गई। सरस्वती को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करने के बावजूद उसके दुनिया छोड़ चले जाने से कन्नौज में बुधवार को माहौल गमगीन रहा। गांव में सुबह सरस्वती के अंतिम संस्कार में शामिल हर शख्स की आंख भी नम नजर आई।
कन्नौज निवासी २६ वर्षीय सरस्वती (स्वाति) गोस्वामी की पिछले एक वर्ष से गंभीर बीमार थी। उसकी जिंदगी बचाने के लिए चिकित्सकों ने लीवर ट्रांसप्लान्ट कराने की सलाह दी थी। परिजनों ने कुछ दिन पहले ही उसे अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल में भर्ती करवाया था। स्वाति उदयपुर की एक आईटी कंपनी में सीनियर रिसर्च एनालिस्ट पद पर कार्यरत थी। लगातार तीन साल तक काम करने के बाद उसने बीमारी से परेशान होकर जुलाई २०१८ में काम छोड़ दिया था।
उपचार के लिए जुटाई लाखों रुपए की मदद
स्वाति के उपचार के लिए चिकित्सकों ने करीब १८ लाख रुपए का खर्च बताया था। राजस्थान पत्रिका ने ९ मार्च के अंक में सरस्वती की जिंदगी को दुआ और दवा की दरकार शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया तो कन्नौज गांव के कई लोग अपने गांव की बेटी की जिंदगी बचाने की मुहिम में जुड़ गए। सरस्वती को बचाने की मुहिम में लगे भदेसर पंचायत समिति सदस्य ओमप्रकाश जाट ने बताया कि पत्रिका में समाचार प्रकाशित होने के बाद कई लोगों ने आर्थिक सहायता की। उदयपुर सहित राज्य व देश के विभिन्न क्षेत्रों से भी सरस्वती की मदद को हाथ बढ़़े थे एवं करीब १८ लाख रुपए की राशि ऑनलाइन जमा भी हो गई लेकिन मां शांता का लीवर बेटी से मैच नहीं कर पाने से ट्रांसप्लान्ट नहीं हो पाया।