खरीफ की हर फसल बीमार, विकराल हो रहा फाल आर्मी वर्म

-कृषि विभाग ने फसलों में किया रेपिड रोविंग सर्वे
-कर्ज में दबे किसानों पर फिर आ गई आफत
-बर्बाद हो सकती है फसलें, उत्पादन में भी आएगी गिरावट
-मंूगफली की फसल को हो गया पीलिया
चित्तौडग़ढ़
चित्तौडग़ढ़ जिले में खरीफ की हर फसल कीट प्रकोप और रोगों के चलते बीमार हो गई है। मक्का और ज्वार की फसल में फाल आर्मी वर्म नाम का कीट विकराल रूप लेता जा रहा है। चपेट में आई फसलों से कर्ज में दबे किसानों पर एक बार फिर आफत आ गई है। फसलों के बर्बाद होने और उत्पादन में गिरावट को लेकर किसानों के मन में आशंकाएं घर कर गई है। कृषि विभाग की ओर से किए गए रेपिड रोविंग सर्वे में जिले में खरीफ फसलों की यह तस्वीर सामने आई है।
खरीफ की फसलों में कीट और रोगों से होने वाले नुकसान का आकलन करने के लिए कृषि अधिकारियों और वैज्ञानिकों की टीम ने मंगलवार को जिले मेें बस्सी, केलझर बिजयपुर, अमरपुरा, कनेरा, केली, गादोला, निम्बाहेडा, मांगरोल, सतखण्डा व अरनियापंथ गांव में यह सर्वे किया गया। इस दौरान मक्का व ज्वार की फसल में फाल आर्मी वर्म और तना छेदक कीट का जहां बड़ी तादाद में प्रकोप देखने को मिला वहीं, इन फसलों में सुक्ष्म तत्वों की भी कमी पाई गई है। मूंगफली की फसल को टिक्का और पीलिया रोग ने चपेट में ले लिया है। कपास की फसल को रस चूसक और सोयाबीन को सेमीलूपर व गर्डल बिटल ने शिकंजे में ले लिया है। जबकि जिले में सर्वाधिक बुवाई मक्का और सोयाबीन की हुई है।
अधिकारियों का यह दावा
कृषि विभाग के अधिकारियों का दावा है कि अब तक तो फसलों में कीट और रोग का प्रकोप आर्थिक नुकसान स्तर से कम है। ऐसे में किसानों को फसल बीमा योजना के पत्रक भी बांटे गए हैं।
किसानों को सुझाए गए हैं ये उपाय
किसानों को सलाह दी गई है कि मूंगफली की फसल में टिक्का रोग पर नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी या 2 किलोग्राम मेन्कोजेब प्रति हैक्टयर प्रयोग करें। पिलिया रोग के उपचार के लिए 0.5 प्रतिशत हरा कसीस के घोल का छिडकाव करने की सलाह दी गई है।
फाल आर्मी से ऐसे बचाएं
मक्का व ज्वार की फसल में फाल आर्मी वर्म नियंत्रण के लिए एजाडिरेक्टिन 1500 पी.पी.एम. की 5 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी के साथ घोल बनाकर छिड़काव करने या फसल मे इस कीट से 10 से 20 प्रतिशत नुकसान होने पर इमामेक्टिन बेन्जोएट की 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी या स्पाईनोसेड की 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी घोल कर छिड़काव करने को कहा गया है।
कपास की फसल में रस चूसक कीटों के नियंत्रण के लिए 0.2 मिली लीटर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस. एल. प्रति लीटर पानी में या 650-700 ग्राम प्रति हैक्टयर एसीफेट 75 एस. पी. का प्रयोग करने को कहा है।
सोयाबीन की फसल में सेमीलूपर की रोकथाम के लिए एसीफेट 75 एस.पी. एक ग्राम प्रति लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. दो मि.ली. प्रति लीटर पानी व गर्डल बीटल की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. एक लीटर प्रति हैक्टयर या ऐसिफेट 75 एस.पी. 500 ग्राम प्रति हैक्टयर से छिड़कावे करने व 20 दिन के अन्तराल पर फिर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इससे पहले टीम ने कपासन क्षेत्र के कांकरिया, रूपाखेड़ी, मुगांना, भूपालसागर, उसरोल, जाशमा, सुरजपुरा आदि गांवों का भी दौरा किया था।
इस टीम ने किया सर्वे
सर्वे करने वाली टीम में कृषि वैज्ञानिक ओ.पी.शर्मा, मृदा वैज्ञानिक रतनलाल सोलंकी, अरविन्द मीणा, पी.एल. भट्ट, उप निदेशक भूपेन्द्र सिंह राठौड़, सहायक निदेशक डॉ. शंकरलाल जाट, उद्यान वैज्ञानिक डॉ. राजेश जलवानिया, ज्योति प्रकाश सिरोया, दिनेश चन्द्र झंवर शामिल थे।