आखिर क्यो नहीं आया विधायक को इस स्कूल के भविष्य पर तरस

परसाद (उदयपुर). दो कक्ष और 224 विद्यार्थी। पेड़ पर लटकता बोर्ड, बैठने को दरी पट्टी नसीब नहीं। सर्द दिनों में किताबों के पृष्ठों पर बैठक और रिक्त पदों से प्रभावित शैक्षणिक कार्य। गुरुकुल के जमाने से भी बद्तर हाल और नाम है इसका आदर्श विद्यालय।
कुछ यही हकीकत है गिर्वा ब्लॉक से गुजरते राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थापित पाराई गांव से १६ किलोमीटर दूर स्थित नई पंचायत सरुपाल के राजकीय माध्यमिक विद्यालय की। गुणवत्ता युक्त शिक्षा के नाम पर यहां जनजाति बाहुल्य विद्यार्थियों से औपचारिकता हो रही है। हकीकत जानकर ही जहन में कई सवाल खड़े होने लगते हैं, लेकिन शिक्षा के नाम पर दूरदराज के ग्रामीण बच्चों से हो रहे इस मजाक को लेकर जिला शिक्षा विभाग, विधायक, जनप्रतिनिधि और सरकारें आंख मूंद कर बैठी है। स्थिति यह जानकर और चकित करती है कि इस विद्यालय को विधायक फूलसिंह मीणा ने पिछले ५ साल से गोद ले रखा है। लोगों की सुनी सुनाई बात पर जब राजस्थान पत्रिका के इस संवाददाता ने हकीकत जानने के प्रयास किए तो नजारे आश्चर्यचकित करने वाले मिले।

आंखों देखा सच
- दो कमरों में संचालित विद्यालय के जीर्ण-शीर्ण हाल हैं।
- एक कमरे में कार्यालय व दूसरे कक्ष में कक्षा लगती है।
- कक्षा एक से ९वीं तक कुल 224 विद्यार्थियों का नामांकन है।
- पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी कक्षा एक कमरे में लगती है।
- 5वीं कक्षा बरामदे में तो 6ठी कक्षा कीकर वृक्ष के नीचे लगती है।
- 7वीं कक्षा कमरे की बाहरी दीवार के पास।
- 8वीं कक्षा कमरे के पिछवाड़े खुले में चलती है।
- 9वीं कक्षा प्रधानाध्यापक के कमरे में लगती है।
- पेयजल के नाम पर फ्लोराइड की अधिकता वाला एक हैंडपंप है।
- फ्लोराइड बर्तनों में पीलेपन के तौर पर जम जाता है।
- हैण्डपंप बिगडऩे पर प्यास बुझाने की दूरी २ किलोमीटर तय हैं।
- शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद १६ हैं, जिनमें ९ रिक्त हैं।
- प्रधानाध्यापक, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, गणित, विज्ञान व अंग्रेजी के शिक्षक पद रिक्त हैं।

शिक्षा का मजाक
बचपन से हमने सीखा है कि किताब को भूलवश किता पर पैर लग जाए तो उसे सिर पर लगाकर विद्या की देवी सरस्वती से माफी मांगी जाती है, लेकिन आदर्श विद्यालय के संस्कार ऐसे हैं कि बच्चे किताब के मुख्य पृष्ठ को निकालकर उस पर बैठते हैं। ताकि कपड़ों को गंदा होने से बचाने के साथ सर्दी से बचाव हो सके। कीकर वृक्ष की छांव में चल रही छठी कक्षा के विद्यार्थी कटी-फटी ३ दरियों तक सीमित थे। कुछ बच्चे किताबों के पुठ्ठे पर बैठे थे।

कहता है इतिहास
वर्ष 1983 में स्वीकृत राप्रावि वर्ष 2015 में उप्रावि बना। वर्ष 2018 में माध्यमिक विद्यालय में क्रमोन्नत हुआ। वर्ष 2017 में विधायक व जिला प्रमुख के मद से दो कक्षाकक्ष स्वीकृत हुए। एक साल से कार्य अधूरा ही पड़ा है। पत्रिका की पड़ताल में सामने आया कि पोषाहार व्यवस्था के नाम पर बड़े बच्चों को डेढ़ व छोटे बच्चों को एक रोटी मिलती है। दूध और फलों का वितरण नियमानुसार होता है।

रिक्त है पद
मेरी पहली जोइनिंग है। हाल ही में जोइन किया है। विद्यालय विकास को लेकर किससे बात करनी होती है। मुझे जानकारी नहीं है। संस्था प्रधान का पद रिक्त है।
अनिल मईड़ा, व्यवस्थापक, राआउमावि सरुपाल

भवन तक नहीं बनवा पाए
विद्यालय विकास के लिए कई बार विधायक व स्थानीय सरपंच को लिखित में दिया। गांव गोद लेने के बाद भी बालकों के हित में किसी स्तर पर सहयोग नहीं मिला।
अल्पेश मीणा, ग्रामीण