आखिर कहां खो गए गांव-1 : देहरादून से उदयपुर के खजूरी गांव में आए न‍िशांत लाना चाहते हैं श‍िक्षा में बदलाव की बयार

ग्रामीण जीवन की कल्पना मात्र से ही रोमांचित था। वह माटी की सौंधी महक और खुली आबोहवा। पशु-पक्षी और ठेठ देहाती पहनावा। देहरादून से उदयपुर जिले के खजूरी आने के दौरान ग्राम्य जीवन के बारे में पढ़े किस्से व कहानियां दिमाग में ट्रेन के साथ-साथ दौड़ते रहे। अहमदाबाद हाइवे की तरफ स्थित खजूरी गांव पहुंचा तो एकबारगी सोचना-समझना भूल गया। ऐसा भी गांव है कि जहां बिजली व पानी की पहुंच अब हो रही है। ताज्जुब। कहां खो गया विकास। मेरी दादी की मां भी शिक्षक थी। ऐसे में पहली पड़ताल शिक्षा को लेकर की तो स्टेट्स जानकर हैरत हुई। अधिकतर बच्चे मजदूरी के चक्कर में पढ़ाई छोड़ देते हैं। अब इनके लिए शिक्षा से ज्यादा मजदूरी जरूरी क्यूं हो गई? कोई नहीं बता पाया। शिक्षा से दूर बच्चा धीरे-धीरे नशे की गिरफ्त में भी आ जाता है। अभिभावक फिर भी क्यूं नहीं समझते।

इधर, यहां के लोग तो रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाले हैं। थके-हारे मजदूर से कैसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वह घर आकर देखे कि उसके बच्चे ने आज स्कूल में क्या पढ़ा और क्या नहीं? जिसने समंदर नहीं देखा, उसे क्या पता कि समंदर कितना बड़ा होता है? उसे समंदर तो दिखाना ही पड़ेगा।
खैर, खजूरी गांव में इन हालातों पर मुझे रोना नहीं बल्कि एक युवा होने के नाते गांव को मुख्यधारा से जोडऩे का समाधान खोजना है। भौगोलिक रूप से खजूरी गांव पहाड़ी पर स्थित है और विद्यालय तथा पंचायत सबसे ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। शेष घर छोटी-छोटी पहाडिय़ों पर हैं। सूचना के युग में यह गांव सूचनाओं से दूर है। साक्षर नहीं है तो अखबार कहां से पढ़ेंगे? टीवी व रेडियो ही नहीं है तो सुने और देखे कैसे?
मुझे यहां विचार आया है कि अगर पंचायत में एक कंट्रोल रूम बनाया जाए और एक ऐसे स्थान पर स्पीकर लगाया जाए, जिससे सबको सूचनाएं पहुंचे तो यह कैसा रहेगा? शिक्षा-स्वास्थ्य की सूचनाएं विद्यालयों के शिक्षकों, आशा व एएनएम के जरिए बच्चों के अभिभावकों तक पहुंचाएंगे। इतना ही नहीं, मैं चाहता हूं अभिभावकों को यह भी जानकारी दें कि उनका बच्चा पढ़ाई में क्या कर रहा है और उसमें क्या प्रतिभा है? सूचना के युग में अब खजूरी में तो सूचनाएं पहुंचाने का एकमात्र यही जरिया दिख रहा है। इसके लिए मेरे युवा साथियों के सहयोग की भी आवश्यकता है। आर्थिक भार भी ग्रामीणों तक नहीं पहुंचे, इसकी व्यवस्था भी करेंगे।
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उदयपुर के मेरे युवा साथियों के लिए यह एक चैलेंज है। देहरादून से हूं और आजकल आपके गांव खजूरी में रहता हूं। आदिवासी परिवारों के साथ। फैलोशिप कर रहा हूं। यहां कई समस्याएं हैं, आगे भी आती रहेगी, बात समाधान खोजने की है। मुझ और आप जैसे युवाओं के लिए...इसे चैलेंज मानें या फिर मेरी तरह नवाचार...आप तय करें...जैसा देखा..वैसा यूथ के लिए लिखा है...उदयपुर पत्रिका फेसबुक पेज पर आपके कमेंट्स का इंतजार रहेगा।

 

- निशांत वशिष्ठ, गांधी फैलोशिप