अब रेडिमेड व चाइना के दीपक कर रहे धंधा चौपट

भीलवाड़ा।

पुराने समय में हाथों से चाक घुमाकर माटी के बर्तनए दीये आदि बनाए जाते थे। अब नये परिवेश और आधुनिकीकरण के दौर में चाक भी बिजली से चलने लगे हैं।

बदलाव की इस आंधी में भी नहीं उड़ी तो वह है हमारी परम्पराएं और रीति.रिवाज। अब भी वही गीली माटी है और उस माटी को कलात्मक आकार देते सुघड़ और सधे हुए हाथ। दादा चाक पर गीली माटी को ही दीयों के आकार में नहीं ढाल रहेए बल्कि अपने पोते-पोतियों के कोरे कागज से दिल पर भी पुश्तैनी हुनर की छाप छोड़ रहे हैं। यही कारण है कि पोते-पोती दादा के बनाए दीयों को धूप में सुखाने.पकाने के साथ ही जिद करके चाक पर भी हाथ आजमा रहे हैं।

नन्ही और नर्म-नाजुक अंगुलियों को माटी के लोथड़े को दीयों में ढालते देख लगता है कि शहर के माणिक्य नगर में रहने वाले भैरुलाल प्रजापति पुश्तैनी कला को अपनी तीसरी पीढ़ी को सौंप देना चाहते हैं।

तैयारी रोशनी बाटने की
दीपावली नजदीक आने का एहसास माटी के हुनरबाजों की चौखट व छतों पर सूखते दीये देखकर हो जाता है। प्रजापति समाज के लोग दीयेए हीड़ए धूपेड़े आदि बनाने लगे हैं। बुजुर्ग भैरू लाल बताते हैं कि दीपक बनाने की तैयारी एक माह पूर्व से करते हैं। हालांकि नए दौर में गुजरात व चीन के बने रेडिमेड दीयों ने रोजगार कम कर दिया है। दीये का प्रचलन अब सिर्फ शगुन के लिए रह गया है। इसके चलते जरूरत मुताबिक ही बनाये जा रहे हैं।

जुटता है पूरा परिवार
दादा के काम करते देख पोते.पोती भी हाथ बंटाते दिखे। इसके अलावा परिवार के सदस्य मिट्टी ष्घंूदनेष्से लेकर सुखाने तक का काम करते हैं।

गांवो से लाते हैं मिट्टी
शहर के विस्तार के चलते अब मिट्टी मिलना मुश्किल हो रहा है। मिट्टी बनेड़ा क्षेत्र से लानी पड़ रही है। बारिश अच्छी नहीं होने से मिट्टी में चिकनापन नहीं है। ऐसे में दीयों की बनावट में अंतर आता है।

पंकज त्रिपाठी