अंधकार को दूर करने वालो के जीवन में अंधेरा

मेवाड़ किरण @ नीमच -

अपना जावद @ नोशाद अली
हर भारतीय नागरिक को अपनी परम्परा को जिंदा रखकर निभाना एक अहम भूमिका होती है। आज के इस आधुनिक में इंसान की भी रोज बदलती जाती है यही वजह है कि वह अपनी कला, संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। अपनी संस्कृति और विरासत की उपेक्षा करना एक तरह की आधुनिकता बन गयी है। आधुनिकता की चकाचौंध ने भारतीय परंपरा और त्यौहारों के को तहस- नहस कर दिया है जिसके चलते सदियों से चली आ रही पुरानी रिवायती वस्तुएं अपने वजूद से कोसो दूर भाग रही है आधुनिकता का असर दिपावली जैसे पर्वों पर भी पड़ा और वह रिवायतों से दूर होती जा रही है। आज में इस युग में भले ही चाइनीज आइटम की हवा प्राचीन रीति रिवाजों को पीछे छोड़ने का प्रयास कर रही है। ऐसे में हर कोई इलेक्ट्रॉनिक आयटम की ओर आकर्षण होता आ रहा है। करवाचौथ एवं दीपावली पर्व नजदीक होने के चलते इनदिनो एक तबका अपनी कला के जरिये आकर्षक मिट्टी का सामान तैयार करने में व्यस्त हो गये है वह और उनका परिवार इस कार्य में जुट जाता है। दीपावली पर्व धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीये बनाने का भी उपयोग होता है। इसी के लिए दशहरा पश्चात एक तबका जुटकर मिट्टी के दीये बनाकर दीपावली पर्व पर घर सहित अन्य जगहों को रोशन करते। चाइनीज आइटम को लेकर देश में बहिष्कार के बाद कुंभकार के चाक ने गति पकड़ ली है जिससे दीपावली की जगमग में परंपरागत मिट्टी के दीयों की मांग तेज हो गई है। जैसे जैसे दीपावली पर्व नजदीक आ रहा है उनके दीपक बनाने गर्ति तेज हो गई कुम्हार भी इन दोनों पर्वो से बेहद उम्मीदें लगाए बैठे हैं कि उन लोगों को मुनाफा होगा तो उनकी भी दीपावली अच्छी होगी।
नगर के रामपुरा दरवाजा स्थित के पास मुक्तिधाम की और सत्यनारायण प्रजापत द्वारा मिट्टी की वस्तुओं को बनाने का पुश्तैनी काम होता है। दीपावली का पर्व आते ही इन लोगों के यहां चाक का पहिया तेजी से घूमने लगा और मिट्टी के दीपक, करवा और सकोरा आदि वस्तुएं बना रहे हैं। वे कहते हैं कि दीपावली पर मिट्टी के दीपक, करवा और सकोरा आदि की बेहद डिमांड होती है। दीपावली पर अच्छी बिक्री होने से मुनाफा ठीक हो जाता है। हालांकि झालरों ने मिट्टी के दीपक की डिमांड कम की है वहीं करवाचौथ पर पीतल व स्टील के करवा के साथ ही मिट्टी के करवा का भी चलन होता। दीपावली तो रोशनी का पर्व है, ऐसे में जब तक मिट्टी से बने दीये रोशन नहीं होते, तब तक अंधेरा छंटता नहीं दिखता है उनके द्वारा महज 10 सेकंड में एक दीपक को आकृति दी जाती है प्रत्येक करीबन 300 दीए बनाए जाते हैं। चाक पहिया पर दीपक, घड़ा, मलिया, करवा, गमला, गुल्लक सहित अन्य बनाए जाते हैं। मिट्टी का घोल बनाना, घोल को गाड़ा करना, मिट्टी गूंथना, चाक पर मिट्टी के दीये को आकार देना, आवा जलाना व पके हुए दीये को व्यवस्थित रखना भी पड़ता है। वह पूरी मेहनत और शिद्दत से मिट्टी के उत्पादों के निर्माण में लगा है।

Source : Apna Neemuch